दारू नाम के एक वन में कुछ ऋषि मुनि वर्षों से #शिव जी की तपस्या कर रहे थे. वंहा पर शिवाजी लिंग रूप में प्रकट हो गये.
उस आश्रम में शिव जी की ऊर्जा तो प्रयाप्त मात्रा में थी, परन्तु शक्ति यानी की पार्वती की पूजा न होने के कारण
, वहां के निवासियों की स्त्रियां ,
महादेव शंकर जी के लिंग रूप को देख कुछ स्त्रियां व्याकुल हो अपने-अपने आश्रमों में वापिस लौट आईं , परन्तु कुछ स्त्रियां उन की पूजा करने लगीं ।
वहां के अल्प बुद्धि के ऋषि लोग , महादेव जी के शिव लिंग रूप में देख कर
कहने लगे कि -‘‘यह इस लिंग रूप में क्यों यहां आये हो?
‘‘यह सुन शिवजी ने कुछ न कहा , तब ऋषियों ने उन्हें श्राप दे दिया कि –
‘‘तुम बिना लिंग के हो जाओ ‘‘उनके ऐसा कहते ही शिवजी का लिंग आगे खड़ा हो अग्नि के समान जलने लगा , वह पृथ्वी पर जहां कहीं भी जाता जलता ही जाता था जिसके कारण सम्पूर्ण आकाश , पाताल और स्वर्गलोक में त्राहिमाम् मच गया , यह देख ऋषियों को बहुत दुख हुआ ।इस भयंकर स्थिति से निपटने के लिए ऋषि लोग ब्रह्मा जी के पास गये , उन्हें नमस्ते कर सब वृतान्त कहा , तब – ब्रह्मा जी ने कहा – आप लोग शिव के पास जाइये , शिवजी ने इन ऋषियों को अपनी शरण में आता हुआ देखकर बोले – हे ऋषि लोगों !
आप लोग पार्वती जी की शरण में जाइये ।
इस ज्योतिर्लिंग को पार्वती के सिवाय अन्य कोई धारण नहीं कर सकता ।
यह सुनकर ऋषियों ने पार्वती की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया , तब पार्वती ने उन ऋषियों की आराधना से प्रसन्न होकर उस ज्योतिर्लिंग को अपनी योनि में धारण किया । तभी से ज्योतिर्लिंग पूजा तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुई तथा उसी समय से शिवलिंग व पार्वतीभग की प्रतिमा या मूर्ति का प्रचलन इस संसार में पूजा के रूप में प्रचलित हुआ । – ठाकुर प्रेस शिव पुराण चतुर्थ कोटि रूद्र संहिता अध्याय 12 पृष्ठ 511 से 513
#शिवजी